Saturday, July 3, 2010
साहित्य क्यों ?
समाज का आइना है साहित्य .साहित्य में अपने आसपास घटित होने वाली हर घटना का हुबहू चित्र हमें दर्ष्टिगत होता है .लेकिन दुनिया बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है ,एक ओर जहाँ स्पर्धा में कौन कितना आगे निकलता है , धन दोलत शोहरत कमाने के लिए परिवार से ,समाज से उतना ही दूर होने लगा .स्वार्थ .ईर्ष्या, अमानवीयता ,संकुचितता उतनी ही पनपने लगी .साहित्य हमें जीने का तरीका शिखाता है ,हमें संस्कार देता है , संवेदना को जाग्रत करता है , मनुष्य के पास सब कुछ होते हुए भी वह बिलकुल खाली है कोरे कागज़ की तरह .मैथिलि शरण गुपतजी ने ठीक ही कहा है -"वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे " कई बार लोग सवाल करते है -आखिर कबीर ,तुलसी, मिरां ,सूरदास पढ़कर कया करेंगे वो नौकरी तो नहीं देते इतना पढने के बाद भी बेकारी मिलती है मेरा तो यह मानना है की इस देश के सभी विद्यार्थियों के पाठयक्रम में साहित्य अनिवार्य रूप से होना चाहिए क्योकि उसके माँ बाप के पास समय नहीं है , उससे बात करने का ,संस्कार देने का ,अच्छाई और बुराइ का ज्ञान देने का टेलिविज़न से ,अपनी आया से ,अपने दोस्तों से जो भी थोडा बहुत शिख कर अपने जीवन की नैया चलाता है .विज्ञानं,तकनिकी ,अर्थ , गणित आदि से एक बुद्दिजीवी के आधार पर उसकी गिनती हो सकती है लेकिन इस संसार में मनुष्य के जीवन की सफलता उसे तभी मिल सकती है जब सही में अर्थ में वह मनुष्य बन जायेगा .साहित्य की " सत्यम शिवम् सुन्दरम "की भावना उसे नयी राह दिखा सकती है .
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