Thursday, April 22, 2010
दोहरे लोग
अच्छे भी, बुरे भी लोग इस दुनिया में रहते है ,लेकिन कोण अच्छा और कोण बुरा पता नहीं चलता है ,हँस के दो चार बाते करके हमें अपना बनाकर हमें ही धोका देने वाले लाखो लोग है। जो सवार्थी है वह जयादा सावधान हो कर काम निकल ही लेते है ,इन दोहरे लोगो का पर्दाफाश किया जाई,भोले भाले लोगो का कोई काम नहीं इस दुनिया में अपना रोब जमाव ,काम बनावो ये केवल दोहरे लोगो का समय है । इन्सान अपनी मर्यादा भूल गया ,अपना धर्म भूल गया ।
Wednesday, April 21, 2010
किनारा
बारिश की धारा तो हूँ पर सहारा कहाँ !
बिजली बनकर गिरती तो हूँ पर उजाला कहाँ !
उम्र भर सब को संजोती तो हूँ पर मेरे कहाँ !
कल्पना, बस किनारा तो है, मंझिल कहाँ !
उस किनारे के मिलन की आस तो है ,पर अब किनारा कहाँ !!!!!!!!!
Sunday, April 18, 2010
स्त्री
घर और बाहर का लम्बा सफ़र करते स्त्री के जीवन में काफी बदलाव आया है ,अपनी कमाई से परिवार को आर्थिक सहारा दे रही है ,यानि वह दोहरा जीवन व्यतीत कर रही है ,दफ्तर में चाहे वह कितना महत्वपूर्ण कार्य करके आने के बाद भी उसकी उपेक्षा होती है,ऑफिस में भी मानसिक एवं शरीरिक शोषण होता है । कामकाजी महिलाये घर और बाहर दोनों जगह सामंजस्य बिठाने का प्रयाश करती दिखाई देती है । लड़ाई अभी कहाँ ख़तम हुई है । जब स्त्री के कार्य का हिस्सा गिना जायेगा ,तब मानसिक रूप से सफल एवं सार्थक हो सकता है ।
साथी

बरस जाओ बारिस की तरह
हम भी, ना रहे, हम
भीगे तन ,मन
जहाँ बस प्यार ही प्यार हो
नफरत की ना दीवार हो
साथ तेरा रहे यूँ ही
साथी मेरे
जनम जनम
Thursday, April 15, 2010
कब तक

हम सहे, कब तक ?
बहती ज़ुल्म की बारिस को.....
ना जाने यह बिजली हम पर ही गरज रही ,
कृष्ण की बांसुरी कहीं खो गई ?
या
इन्सान अब नहीं रहा इन्सान
झगमगती दुनिया में
अपनी काली करतूत छुपाते ,
आखिर , बदनाम मुझे ही करता ,
कब तक मेरी आँखों से,
ये नज़ारे में देखू,
क्या में एक इन्सान भी नहीं ?
लेकिन......................
तुम जो कर रहे हो वो भला इन्सान तो नहीं करता
कब तक हाँ ,कब तक ? ??????
'कल्पना' सोच रही हे
जब तक ऐसे लोगो को दिन में तारे ना दिखा दें तब तक
तब तक
Sunday, April 11, 2010
मुझे कैसे रोकोगे
हवा को आज तक कोन बांध सका है ,
में भी हवा की तरह बह चली
मुझे कैसे रोकोगे !
रेत हाथ से फिसल ही जाती है ,
में भी रेत की तरह उड़ चली
मुझे कैसे रोकोगे !
नदी पहाड़ पे कब रूकती है,
में भी नदी की तरह खुद रास्ता चुनती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
नारी हो तुम ,याद रखना ये कहते है,
में भी चंडी बन सकती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
में भी हवा की तरह बह चली
मुझे कैसे रोकोगे !
रेत हाथ से फिसल ही जाती है ,
में भी रेत की तरह उड़ चली
मुझे कैसे रोकोगे !
नदी पहाड़ पे कब रूकती है,
में भी नदी की तरह खुद रास्ता चुनती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
नारी हो तुम ,याद रखना ये कहते है,
में भी चंडी बन सकती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
Saturday, April 10, 2010
नारी की उडान

में नारी ही ठीक हु ,मुजे ना देवी बनना है,ना ही परी,
दुनिया का सर्जन करने की ताकत है,
माँ भी ,बहन भी ,पत्नी भी,पुत्री भी,
वात्सल्य की धारा भी,
जब से कदम आगे बढाया
तब से मुड़कर नहीं देखा ,
सदियों से लावा की तरह खोलने वाले
विचारो को कलम में पिरो कर
राहत महसूस karna chahti हूँ
अब मेरी भीतर की आग को
पुरुष वादी समाज में फैलाना
मेरा मकसद है,
तेरी हाँ में अगर मेने हाँ मिलाई
t महान, नहीं तो ................
आसमान के पार
मेरा ठिकाना ,धरती मेरी बाँहों में,
मेरी उडान से विचलित होना नहीं
बेचारी नहीं, तेरी नानी हूँ
इतना समज ले तूफान में naiya को कैसे
कैसे संभालना मैंने अब शिख लिया है
आंधी में भी बिजली की तरह निकल जाउंगी,
आंसू मेने सोख लिए है
बची है एक चिंगारी
बहुत है जीवन के लिए .......
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