हवा को आज तक कोन बांध सका है ,
में भी हवा की तरह बह चली
मुझे कैसे रोकोगे !
रेत हाथ से फिसल ही जाती है ,
में भी रेत की तरह उड़ चली
मुझे कैसे रोकोगे !
नदी पहाड़ पे कब रूकती है,
में भी नदी की तरह खुद रास्ता चुनती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
नारी हो तुम ,याद रखना ये कहते है,
में भी चंडी बन सकती हूँ
मुझे कैसे रोकोगे !
Sunday, April 11, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment