
में नारी ही ठीक हु ,मुजे ना देवी बनना है,ना ही परी,
दुनिया का सर्जन करने की ताकत है,
माँ भी ,बहन भी ,पत्नी भी,पुत्री भी,
वात्सल्य की धारा भी,
जब से कदम आगे बढाया
तब से मुड़कर नहीं देखा ,
सदियों से लावा की तरह खोलने वाले
विचारो को कलम में पिरो कर
राहत महसूस karna chahti हूँ
अब मेरी भीतर की आग को
पुरुष वादी समाज में फैलाना
मेरा मकसद है,
तेरी हाँ में अगर मेने हाँ मिलाई
t महान, नहीं तो ................
आसमान के पार
मेरा ठिकाना ,धरती मेरी बाँहों में,
मेरी उडान से विचलित होना नहीं
बेचारी नहीं, तेरी नानी हूँ
इतना समज ले तूफान में naiya को कैसे
कैसे संभालना मैंने अब शिख लिया है
आंधी में भी बिजली की तरह निकल जाउंगी,
आंसू मेने सोख लिए है
बची है एक चिंगारी
बहुत है जीवन के लिए .......
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