
हम सहे, कब तक ?
बहती ज़ुल्म की बारिस को.....
ना जाने यह बिजली हम पर ही गरज रही ,
कृष्ण की बांसुरी कहीं खो गई ?
या
इन्सान अब नहीं रहा इन्सान
झगमगती दुनिया में
अपनी काली करतूत छुपाते ,
आखिर , बदनाम मुझे ही करता ,
कब तक मेरी आँखों से,
ये नज़ारे में देखू,
क्या में एक इन्सान भी नहीं ?
लेकिन......................
तुम जो कर रहे हो वो भला इन्सान तो नहीं करता
कब तक हाँ ,कब तक ? ??????
'कल्पना' सोच रही हे
जब तक ऐसे लोगो को दिन में तारे ना दिखा दें तब तक
तब तक
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