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Wednesday, April 21, 2010
किनारा
बहती नदिया की
धारा
तो हूँ पर किनारा कहाँ
बारिश की धारा तो हूँ पर सहारा कहाँ !
बिजली बनकर गिरती तो हूँ पर उजाला कहाँ !
उम्र भर सब को संजोती तो हूँ पर मेरे कहाँ !
कल्पना, बस किनारा तो है, मंझिल कहाँ !
उस किनारे के मिलन की आस तो है ,पर अब किनारा कहाँ !!!!!!!!!
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